प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा के सामने कई चुनौतियां व संकट थे. देश में उसी साल ऐसा भयानक अकाल पड़ा कि कई राज्यों में आहार के लिए दंगे होने लगे. मिजो जनजातियों ने विद्रोह कर दिया तथा पंजाब में भाषाई आंदोलन सिर उठाने लगा.

पीएम सीरीज़, गौरक्षक, हिंदुस्तान, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, इंदिरा गांधी, राष्ट्रीय राजनीति, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, भारतीय प्रधानमंत्री, संजय गांधी, आपातकाल, आरएसएस
Express Newspapers/Getty
 
 
 
 
 
 

 


7 नवंबर 1966 की बात है. हजारों की तादाद में गौरक्षक, साधु व अन्य धार्मिक नेता गौरक्षा की मांग करते हुए संसद की ओर मार्च कर रहे थे. करनाल (पंजाब) से भारतीय जनसंघ के सांसद स्वामी रामेश्वरानंद के नेतृत्व में यह मार्च संसद भवन की ओर बढ़ने लगा. उस समय सुरक्षा बल की कमी थी, सो ख़तरा देख संसद भवन का मुख्य़ प्रवेश द्वार बंद कर दिया गया. इससे भीड़ हिंसक हो गई और पार्लियामेंट स्ट्रीट पर मौजूद सरकारी भवनों में तोड़-फोड़ मचाने लगी. स्थिति बिगड़ती देख पुलिस ने फ़ायरिंग कर दी, जिसमें आठ साधुओं की मौत हो गई. इस फ़ायरिंग की देशभर में व्यापक निंदा होने लगी. तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वरिष्ठ राजनीतिज्ञ व देश के गृहमंत्री गुलजारीलाल नंदा को पद से हटा दिया.

बतौर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का यह पहला साल था और उनके सामने कई चुनौतियां थीं. मेरी सेटॉन के मुताबिक 1962 में चीन से युद्ध हारने के दुख़ में तत्कालीन प्रधानमंत्री व इंदिरा के पिता जवाहरलाल नेहरू का देहांत हो चुका था. वर्तमान में जैसा माना जाता है कि इंदिरा को प्रधानमंत्री बनाने के लिए उन्होंने बाक़ायदा प्रशिक्षित किया था, उसके विपरीत तब देश के नए प्रधानमंत्री की खोज जारी थी. इंदिरा तो इंग्लैंड में शिक्षा ग्रहण कर रहे अपने बेटे राजीव व संजय गांधी के पास रहने के लिए जाने की योजना बना रहीं थीं. नेहरू की असामयिक मौत से मात्र 19 दिन पहले उन्होंने अपनी मित्र डोरोथी नॉर्मन को पत्र लिख कर अपनी योजना बताई थी कि “वे कम-से-कम एक साल के लिए भारत से बाहर रहना चाहती हैं, और वहां की मुद्रा प्राप्त करने के लिए किसी काम की तलाश में हैं.”

नेहरू ने ख़ुद उनकी परवरिश अपने राजनीतिक जांनशीन के रूप में नहीं की थी. इंदिरा ने जब संसदीय सीटों के लिए चुनाव लड़ने से इंकार किया तो नेहरू ने उनका समर्थन किया तथा उनके भविष्य के लिए कोई ख़ास योजना नहीं बनाई. फरवरी 1959 में इंदिरा गांधी को अख़िल भारतीय कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया तो नेहरू विरोधियों ने इसे बेटी के लिए प्रधानमंत्री पद की राह आसान करना ठहराया. हालांकि, कांग्रेस के ही एक बड़े वर्ग का मानना था कि इंदिरा ने अपने गुणों के आधार पर यह पोस्ट पाई थी.

 

नेहरू की असामयिक मौत से मात्र 19 दिन पहले उन्होंने अपनी मित्र डोरोथी नॉर्मन को पत्र लिख कर अपनी योजना बताई थी कि “वे कम-से-कम एक साल के लिए भारत से बाहर रहना चाहती हैं, और वहां की मुद्रा प्राप्त करने के लिए किसी काम की तलाश में हैं.”

पार्टी अध्यक्ष का पद पाने वाली इंदिरा गांधी चौथी महिला थीं और अध्यक्ष बनते ही उन्होंने अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति का प्रदर्शन कर दिया. केरल में मार्क्सवादी ईएमएस नंबूदरीपाद की सरकार ने भूमि सुधार लागू किए थे. राज्य सरकार ने एजुकेश्नल बिल पारित करा लिया था, जिससे प्राइवेट स्कूलों को नियंत्रित किया जा सके. इससे समाज का प्रभावशाली वर्ग भड़क गया और उसने नंबूदरीपाद सरकार को उखाड़ फेंकने का अभियान चला दिया. इंदिरा ने मौक़े का फ़ायदा उठाया और नंबूदरीपाद सरकार बदल दी गई. भाषाई तनाव बढ़ते देख उन्होंने महाराष्ट्र व गुजरात को अलग करने की सिफारिश भी की.

फरवरी 1960 में उनका अध्यक्षीय कार्यकाल पूरा हो गया. कांग्रेस कार्य समिति ने उनसे दोबारा इस पद पर बने रहने का आग्रह किया, लेकिन इंदिरा ने विनम्रतापूर्वक उसे अस्वीकार करते हुए वरिष्ठ नेता के कामराज को आगे कर दिया. अलबत्ता ख़ुद को पीछे रखते हुए वे अपने पिता व देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की छाया बनी रहीं तथा द्वेष रखने वालों से उनका बचाव करती रहीं. साथ ही उन्होंने इसका भी ध्यान रखा कि यह राजनीतिक गतिविधियां उनके सामाजिक कार्यों तथा अपनी संतानों की परवरिश में रुकावट न बनें.

मगर नियती कुछ और खेल खेल रही थी. 27 मई 1964 को नेहरू की मौत हो गई, जिसके कुछ घंटों बाद ही सिंडिकेट कहलाने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने लाल बहादुर शास्त्री को देश का नया प्रधानमंत्री चुन लिया. राजनीतिज्ञों के राजनीतिज्ञ के.कामराज ने कट्टरपंथी मोरारजी देसाई की जगह शास्त्री को प्राथमिकता दी.

 

फरवरी 1959 में इंदिरा गांधी को अख़िल भारतीय कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया तो नेहरू विरोधियों ने इसे बेटी के लिए प्रधानमंत्री पद की राह आसान करना ठहराया. हालांकि, कांग्रेस के ही एक बड़े वर्ग का मानना था कि इंदिरा ने अपने गुणों के आधार पर यह पोस्ट पाई थी.

इंदिरा गांधी की निकटतम मित्र व सलाहकार पुपुल जयकर के अनुसार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने से पहले शास्त्री ने इंदिरा को बुला कर प्रधानमंत्री पद ऑफर किया था. जयकर ने लिखा है कि “इंदिरा गांधी ने इसे अस्वीकार कर दिया.” क्योंकि “वे महसूस करती थीं कि अगर अभी प्रधानमंत्री बन गई तो बर्बाद हो कर रह जाऊंगी.” फिर शास्त्री ने इस आग्रह के साथ कि उनके बिना वे एक मज़बूत सरकार नहीं बना पाएंगे, उन्हें मंत्री पद का ऑफर दिया. तब इंदिरा ने सूचना व प्रसारण मंत्रालय की ज़िम्मेदारी स्वीकार कर ली.

सितंबर 1965 में पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर स्थित अख़नूर के चंब सेक्टर पर चढ़ाई कर दी. भारतीय सेना ने पश्चिमी पाकिस्तान पर धावा बोला और लाहौर की ओर बढ़ चली. 22 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र संघ ने हस्तक्षेप कर दोनों देशों के बीच युद्धबंदी कराई. जनवरी 1966 में सोवियत रूस के प्रधानमंत्री अलेक्जेयी कोसिगिन ने शास्त्री व पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब खान को उजबेकिस्तान स्थित ताशकंद में संधि के लिए निमंत्रित किया. जिस रात इन दोनों प्रधानों ने संधि पर हस्ताक्षर किए, उसी रात लाल बहादुर शास्त्री को दिल का घातक दौरा पड़ा और उन्होंने वहीं दम तोड़ दिया.

 

इंदिरा गांधी की निकटतम मित्र व सलाहकार पुपुल जयकर के अनुसार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने से पहले शास्त्री ने इंदिरा को बुला कर प्रधानमंत्री पद ऑफर किया था. जयकर ने लिखा है कि “इंदिरा गांधी ने इसे अस्वीकार कर दिया.” क्योंकि “वे महसूस करती थीं कि अगर अभी प्रधानमंत्री बन गई तो बर्बाद हो कर रह जाऊंगी.”

इंदिरा और प्रधानमंत्री का पद

कामराज फौरन इंदिरा को प्रधानमंत्री पद के लिए आगे करने लगे. मोरारजी देसाई के नेतृत्व में वरिष्ठ कांग्रेसियों का एक गुट इसके ख़िलाफ़ था लेकिन कामराज को लगता था कि इंदिरा गांधी में 1967 का चुनाव जिताने की क्षमता है. इसके ख़िलाफ देसाई ने कांग्रेस संसदीय दल के चुनाव करवा कर नेतृत्वकर्ता चुनने का दबाव डाला. शास्त्री की मौत के 9 दिन बाद यह चुनाव हुए. चुनाव अधिकारी ने संसद के सेंट्रल हॉल में अपरान्ह 3 बजे के कामराज को चुनाव परिणाम सौंप दिए. कामराज ने अपने विशुद्ध तमिल लहजे में चुनाव परिणाम घोषित किए, जिसे कांग्रेस के कुछ ही सांसद व पदाधिकारी समझ सके. तुरंत ही कांग्रेस के एक उत्साही नेता ने घोषणा की कि इंदिरा गांधी चुनाव जीत गई हैं. उन्हें 355 जबकि देसाई को केवल 169 वोट मिले हैं.

 

24 जनवरी 1966 को इंदिरा गांधी ने पद व गोपनीयता की शपथ राष्ट्रपति भवन में स्थित भगवान बुद्ध की प्रतिमा के सामने ग्रहण की, जहां लिखा हुआ था — ‘निर्भीक रहो.’ प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा गांधी ने दृढ़ता के साथ काम शुरू किया. यही नहीं इंदिरा का राजनीतिक करियर बनाने वाले के.कामराज को भी बाद में अहसास हुआ कि इंदिरा अपने ढंग से काम करने वाली महिला हैं. इसीलिए एक मौक़े पर उन्होंने इंदिरा के व्यक्तित्व को यूं प्रस्तुत किया, “एक बड़े आदमी की बेटी, एक छोटे आदमी की गलती.”

 

कामराज ने अपने विशुद्ध तमिल लहजे में चुनाव परिणाम घोषित किए, जिसे कांग्रेस के कुछ ही सांसद व पदाधिकारी समझ सके. तुरंत ही कांग्रेस के एक उत्साही नेता ने घोषणा की कि इंदिरा गांधी चुनाव जीत गई हैं. उन्हें 355 जबकि देसाई को केवल 169 वोट मिले हैं.

प्रधानमंत्री बनने के बाद की चुनौतियां?

प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा के सामने कई चुनौतियां व संकट थे. देश में उसी साल ऐसा भयानक अकाल पड़ा कि कई राज्यों में आहार के लिए दंगे होने लगे. मिजो जनजातियों ने विद्रोह कर दिया तथा पंजाब में भाषाई आंदोलन सर उठाने लगा. साथ ही उनके ख़िलाफ दुष्प्रचार ने ज़ोर पकड़ लिया. दिल्ली व देश के कुछ भागों में उन्हें देश के लिए अशुभ बताने वाले पोस्टर लग गए.

इन सबसे विचलित हुए बिना इंदिरा ने अपना सफर शुरू कर दिया. गौरक्षा मामले में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य़ न्यायाधीश एके सरकार की अध्यक्षता में एक समिति गठित कर दी, जिसे यह रिपोर्ट देनी थी कि देश भर में गौवध पर रोक लगाना उचित होगा. इसमें उन्होंने निर्भीकता के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख़िया एमएस गोलवलकर को भी रखा. उनके अलावा पुरी के शंकराचार्य, राष्ट्रीय डेयरी विकास निगम अध्यक्ष वी कुरियन, अर्थशास्त्री अशोक मित्रा सहित अन्य लोग शामिल थे. कुरियन ने बाद में लिखा कि गोलवलकर ने स्वीकार किया था कि नवंबर 1966 में उनके द्वारा चलाए गए गौरक्षा अभियान का मूल उद्देश्य सरकार को परेशान करना था तथा उनके मस्तिष्क में कई राजनीतिक उद्देश्य भी थे. समिति समय पर रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं कर सकी तथा 1979 में मोरारजी देसाई सरकार ने इसे भंग कर दिया.

1967 में इंदिरा गांधी पचास साल की हो गईं और इसी साल होने वाले लोकसभा चुनाव में उन्होंने पहली बार जनता से सीधा सामना करने यानी चुनाव लड़ने का मन बनाया. इसके लिए उन्होंने अपने दिवंगत फिरोज गांधी की सीट रायबरेली चुनी. यही नहीं उनकी क्षमता को लेकर के.कामराज ने जो अनुमान लगाए थे, उन्हें सिद्ध करते हुए इंदिरा ने प्रचार के लिए 45 दिन के चुनाव अभियान में 25 हजार किलोमीटर से ज्य़ादा की यात्रा की.

विपक्ष के निशाने पर

इस चुनाव से पहले देश में समाजवादी आंदोलन आकार लेने लगा था. इसमें यादव, जाट, रेड्डी, पटेल व मराठा जैसी पिछड़ी जातियां शामिल थीं, जिनका कांग्रेस से मोहभंग हो चुका था. कांग्रेस में रह चुके राम मनोहर लोहिया के विचार में सन् 1952, 1957 व 1962 के चुनाव कांग्रेस द्वारा सतत् जीतने पर मतदाता को लगने लगा था कि कांग्रेस को कोई नहीं हरा सकता. इस सोच को बदलने के लिए उन्होंने विपक्ष को सलाह दी कि चुनाव में अपने अलग-अलग उम्मीदवार खड़े करने के बजाय सभी पार्टियों को मिलकर कांग्रेस के सामने एक साझा उम्मीदवार खड़ा करना चाहिए. लोहिया का यह फार्मूला काम कर गया और कांग्रेस को कई जगह हार का मुंह देखना पड़ा. देश के नौ राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकार भी बनी.

स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर महारानी गायत्री देवी ने चुनाव लड़ा और ख़ुद को इंदिरा गांधी की प्रतिद्वंद्वी के रूप में पेश किया. जयपुर में एक आमसभा को संबोधित करते हुए इंदिरा ने पूर्व राजे-महाराजों पर यह कह कर हमला किया कि “जाओ और महाराजाओं व महारानियों से पूछो कि अपने राज में उन्होंने जनता के लिए क्या किया तथा जनता के धन से ऐश करने वाले इन लोगों ने अंग्रेजों के ख़िलाफ़ कितनी जंगें लड़ीं.” बहरहाल 1967 के चुनाव कांग्रेस जीत तो गई, लेकिन उसे सीटों का नुक़सान उठाना पड़ा.

वी.कृष्णा अनंत के मुताबिक 1967 के चुनाव ने भारत की सामाजिक व राजनीतिक संरचना को ख़ासी ठेस पहुंचाई, जिसके बाद में दुष्परिणाम दिखते रहे. इस चुनाव में “गठबंधन, समझौतों के साथ धर्म, जाति आदि के नाम पर भी वोट मांगे गए,” नतीजतन सन् 1947 से एक साझा परिवार की तरह रहते आए भारत को इससे अपूरणीय क्षति पहुंची. वरिष्ठ राजनेताओं द्वारा इस तरह के हथकंडे अपनाए जाने का जवाब इंदिरा ने ख़ामोशी से दिया.

बैंकों का राष्ट्रीयकरण

एक तो यह कि देश के राजे-महाराजों की संपत्तियां उन्होंने भारत सरकार में शामिल कर लीं तथा दूसरा देश के बड़े बैंकों को राष्ट्रीयकृत कर दिया. एक झटके में 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण अपनेआप में बड़ी घटना थी, जिसने आम नागरिकों का दिल जीत लिया. इंदिरा के इस कदम से आमजन कितने उत्साहित थे, इसका अंदाज़ा ‘शू शाइन बॉयज यूनियन’ द्वारा दिए गए एक ऑफर से लगाया जा सकता है. यूनियन की ओर से घोषणा की गई थी कि कांग्रेस अधिवेशन में शामिल होने वाले ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के तमाम प्रतिभागियों के जूतों पर मुफ्त़ में पॉलिश की जाएगी. राष्ट्रीयकृत की जाने वाली बैंकों में सबसे बड़ी सेंट्रल बैंक थी. टाटा द्वारा नियंत्रित इस बैंक में 4 अरब से अधिक रुपए जमा थे. सबसे छोटी महाराष्ट्र बैंक में भी 70 करोड़ रूपए जमा थे. ये उस दौर के मान से बहुत बड़ी-बड़ी रकमें थीं.

 

एक झटके में 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण अपनेआप में बड़ी घटना थी, जिसने आम नागरिकों का दिल जीत लिया. इंदिरा के इस कदम से आमजन कितने उत्साहित थे, इसका अंदाज़ा ‘शू शाइन बॉयज यूनियन’ द्वारा दिए गए एक ऑफर से लगाया जा सकता है.

गरीबी हटाओ’ वाले नारे के साथ सन् 1971 में इंदिरा गांधी सत्ता में वापस लौटीं. एक शक्तिशाली प्रधानमंत्री के रूप में वे स्थापित थीं. इसी दौरान उन्होंने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर के दिखाए. इससे इंदिरा को पूरे देश ने सिर आंखों पर बिठा लिया. इतना ही नहीं तब भारतीय जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें ‘दुर्गा’ की उपाधि से भी नवाजा. पाकिस्तान पर भारत की भारी-भरकम जीत राष्ट्र के लिए गौरव का विषय थी. इसे 1962 में चीन से मिले घाव की भरपाई भी माना गया. सन् 1974 में भारत द्वारा पोखरण में किए गए परमाणु परीक्षण ने इंदिरा का रुतबा देश व संसार में और बढ़ा दिया. इसके बाद 1975 में सिक्किम के भारत में विलय से उनकी छवि एक महान नेता की हो गई.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से मिले कड़वे अनुभवों के कारण उन्होंने कांग्रेस को पूरी तरह नियंत्रण में लेने के प्रयास शुरू कर दिए. कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों को हटा कर वहां उन्होंने अपनी पसंद के मुख्यमंत्री बिठाए. जैसे राजस्थान में मोहनलाल सुखाड़िया की जगह बरकतुल्लाह ख़ान तो मध्यप्रदेश में श्यामाचरण शुक्ला के स्थान पर प्रकाशचंद सेठी को गद्दी सौंप दी गई. पार्टी फंड को भी उन्होंने अपने कब्ज़े में कर लिया.

बेटे संजय ने बढ़ाई मुश्किलें

क्रेवी स्थित विश्वविख्य़ात कार निर्माता कंपनी रोल्स रॉयस से प्रशिक्षित होकर सन् 1969 में इंदिरा का छोटा बेटा संजय गांधी इंग्लैंड से लौटा. यहां आकर उसने छोटी व सस्ती कार बनाने का लाइसेंस लेने के लिए आवेदन दिया. साथ ही तब 23 साल के संजय ने अपने इस प्रोजेक्ट के लिए लोन लेने का आवेदन भी दे दिया, ताकि उसे लाइसेंस जारी किया जा सके. इससे स्वाभाविक ही प्रधानमंत्री पर अपनी संतान को लाभ पहुंचाने के आरोप लगने लगे. मामला संसद में उठाया गया और सदन ने देखा कि इंदिरा मुंह बनाए बहस सुनती रहीं और कंधे झटक कर उन्होंने सारी आलोचनाओं को दरकिनार कर दिया. परंतु बात इतने पर ही नहीं रुकी. हरियाणा में बंसीलाल के अधीन चल रही कांग्रेस सरकार ने संजय के इस कारख़ाने के लिए 300 एकड़ से ज्यादा ज़मीन आवंटित कर दी. इसके लिए लगभग 15 हजार किसानों से उनकी ज़मीन छीन ली गई. 1973 तक इंदिरा गांधी के मुख्य़ सचिव रहे पी.एन.हक्सर ने इस भूमि अधिग्रहण का विरोध किया, तो उन्हें हटा दिया गया.

उधर देश के राजनीतिक परिदृश्य पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जयप्रकाश नारायण का उदय होने लगा. जेपी के नाम से मशहूर जयप्रकाश नारायण तब बिहार में सार्वजनिक जीवन से दूर अपनी दीनचर्या में व्यस्त थे. 1973 में उन्होंने निज अधिकारों तथा जनतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का आह्वान करते हुए कई सांसदों को पत्र लिखे. उन्होंने गणतंत्र के लिए आमजन नाम से एक समूह भी बना लिया, जिसमें दिन-प्रतिदिन सरकार के कामकाज से असंतुष्ट लोग शामिल होने लगे. सरकार से नाराज़ इन लोगों की संख्य़ा बढ़ती जा रही थी. संजय गांधी के मनमाने कामकाज इस समूह का मुख्य़ निशाना हुआ करते थे.

 

हरियाणा में बंसीलाल के अधीन चल रही कांग्रेस सरकार ने संजय के इस कारख़ाने के लिए 300 एकड़ से ज्यादा ज़मीन आवंटित कर दी. इसके लिए लगभग 15 हजार किसानों से उनकी ज़मीन छीन ली गई.

संजय गांधी की बढ़ती सक्रियता के साथ ही कांग्रेस के भीतर एक गुट पनपने लगा, जो प्रधानमंत्री कार्यालय के समानांतर काम कर रहा था. संजय के कमरे में अलग से एक टेलीफ़ोन लाइन डाल ली गई थी इस फोन द्वारा प्रधानमंत्री पुत्र की ओर से महत्वपूर्ण लोगों, पदाधिकारियों को सीधे दिशा निर्देश जारी किए जाते थे. इसमें कई बार तो इंदिरा गांधी को अपने पुत्र व उसके गिरोह की ऐसी असंवैधानिक करतूतों का पता तक नहीं होता था.

आपातकाल

12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में रायबरेली से इंदिरा गांधी के निर्वाचन को (1971 के चुनाव) चुनावी धांधली के कारण शून्य घोषित कर दिया. यही नहीं न्यायालय ने इंदिरा को आगामी छह साल तक किसी भी संवैधानिक पद के लिए भी अयोग्य घोषित कर दिया. ऐसे कठिन समय में इंदिरा के एक निकटस्थ सलाहकार सिद्धार्थ शंकर रे ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत देश में आंतरिक आपातकाल लगाने की सलाह दी. उधर 25 जून 1975 को जेपी, मोरारजी देसाई व अन्य दिग्गज नेताओं ने इंदिरा गांधी को पद से हटाने के लिए दिल्ली के रामलीला मैदान में एक बड़ी जनसभा का आयोजन किया. इसमें जेपी ने एक ज़िद्दी व मनमानी पर उतारू सरकार को पदच्युत करने के लिए लोगों से असहयोग आंदोलन चलाने का आह्वान किया. इसकी अगली सुबह ही इंदिरा ने ‘राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरा’ बताते हुए आपातकाल की घोषणा कर दी.

भारत जैसे विकासशील देश में आपातकाल कोई असामान्य बात नहीं थी. ब्रिटेन में तो एडवर्ड हीथ सरकार ने अपने कार्यकाल में पांच बार इमर्जेंसी लगाई थी. 1962 व 1971 में हुए युद्ध के समय भारत में भी ‘बाह्य’ आपातकाल की घोषणा की गई थी, लेकिन 1975 की गर्मियों में लगाए गए आपातकाल को उचित नहीं ठहराया जा सकता. बहरहाल, आपातकाल की समीक्षा के लिए बनाए गए शाह आयोग ने 1978 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी. इसमें उल्लेख़ किया गया था कि उस समय देश में संविधान को ऐसा कोई बड़ा ख़तरा नहीं था, न ही कानून व्यवस्था कि स्थिति ऐसी चिंतनीय थी कि आपातकाल लागू कर दिया जाए.

 

उधर 25 जून 1975 को जेपी, मोरारजी देसाई व अन्य दिग्गज नेताओं ने इंदिरा गांधी को पद से हटाने के लिए दिल्ली के रामलीला मैदान में एक बड़ी जनसभा का आयोजन किया. इसमें जेपी ने एक ज़िद्दी व मनमानी पर उतारू सरकार को पदच्युत करने के लिए लोगों से असहयोग आंदोलन चलाने का आह्वान किया.

जनवरी 1977 में इंदिरा को महसूस हुआ कि इमर्जेंसी हटा देनी चाहिए. उन्होंने पहले से पंगु हो चुकी लोकसभा को भंग किया और नए चुनाव की घोषणा कर दी. तमाम राजनीतिक कैदियों को भी रिहा कर दिया गया और देश चुनाव की तैयारियां करने लगा. इमर्जेंसी लगाना गलत था, फिर भी वह देश को भरपाई न हो सकने जैसा नुकसान न पहुंचा सकी. आपातकाल में भी वैयक्तिक व राजनीतिक स्वतंत्रता बरकरार थी तथा राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को गोलियों से नहीं उड़ाया गया. यहां तक कि सबसे डरावने 42वें संशोधन द्वारा भी सुप्रीम कोर्ट के अधिकार कम नहीं किए जा सके, न ही चुनाव ख़त्म किए जा सके. बाद में जनता पार्टी सरकार के कार्यकाल में इस संशोधन को ख़त्म कर दिया गया. संक्षेप में यह कि इंदिरा व संजय द्वारा तानाशाही का जो खेल खेलने की कोशिश की गई, उसने भारतीय आमजन को आगाह कर दिया कि उनके जनतंत्र को कैसे ख़तरा उत्पन्न हो सकता है.

1977 के चुनाव में कांग्रेस को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा. इंदिरा गांधी व संजय दोनों चुनाव हार गए. उत्तर प्रदेश में तब लोकसभा की 84 सीटें थीं, वहां से कांग्रेस को एक सीट भी नहीं मिल पाई. पूरे उत्तर भारत में कांग्रेस की यही हालत थी. इंदिरा को इस पराजय का आभास हो गया था. रायबरेली की अपनी सीट के लिए चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने लंदनवासी उद्योगपति स्वराज पॉल से मालूम करने का बोला कि इस सीट की बाबत बीबीसी के प्रख्य़ात संवाददाता मार्क टुली की क्या राय है. टुली ने स्पष्ट कह दिया कि वे हार रही हैं. डिनर टेबल पर इंदिरा ने पॉल से टुली के आकलन पूछा तो पॉल ने दबे शब्दों में हिचकिचाते हुए स्थिति बताई. मगर उन्हें आश्चर्य हुआ जब इंदिरा ने बिना विचलित हुए, शांत भाव से स्वीकार किया कि ‘उनका आकलन सही है.’

इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस महज 153 सीटों पर ठहर गई, जबकि जनता पार्टी को 298 सीटें मिलीं. इस जनता पार्टी में कांग्रेस (ओ), भारतीय जनसंघ, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी व भारतीय लोकदल शामिल थे. चुनाव से बमुश्किल एक महीने पहले जल्दबाज़ी में जनता पार्टी बनाई गई थी. इसमें समाजवादी व दक्षिणपंथी विचारधारा का मिश्रण साफ़ नज़र आ रहा था. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्थन प्राप्त दल जनसंघ का जनता पार्टी में ख़ासा महत्व था. इसीलिए जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी व लालकृष्ण आडवाणी को महत्वपूर्ण मंत्रालयों का प्रभार सौंपा गया.

 

टुली ने स्पष्ट कह दिया कि वे हार रही हैं. डिनर टेबल पर इंदिरा ने पॉल से टुली के आकलन पूछा तो पॉल ने दबे शब्दों में हिचकिचाते हुए स्थिति बताई. मगर उन्हें आश्चर्य हुआ जब इंदिरा ने बिना विचलित हुए, शांत भाव से स्वीकार किया कि ‘उनका आकलन सही है.’

दिलचस्प बात यह है कि जनता पार्टी की सरकार के अवसान में भी आरएसएस का बड़ा योगदान रहा. जनता पार्टी में शामिल चरण सिंह व अन्य समाजवादी नेताओं ने सरकार में शामिल लोगों के अन्य संगठनों से संबद्ध होने का मुद्दा उठाया. जनता पार्टी बनाते समय तय किया गया था कि इसके सदस्य किसी ऐसे संगठन से संबंध नहीं रखेंगे, जिसके उद्देश्य जनता पार्टी से भिन्न हों. सो बागी धड़े ने प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से जनसंघ के नेताओं को हटाने की मांग की, जिनका सीधा संबंध आरएसएस से था. जनता पार्टी में निहित इन्हीं विरोधाभासों, वैचारिक मतभेद, उसके नेताओं की आपसी रस्साकशी का फायदा उठा कर 1980 में इंदिरा गांधी ने वापस सत्ता हासिल कर ली.

ये कहो न पंजा है

1970 के दशक में धर्म निरपेक्षता और समाजवाद को विस्तार देने का उनका जो रूझान दिखाई पड़ता था, वह अब गायब हो चुका था. देश की बहुसंख्यक आबादी यानी हिंदुओं या हिंदू वोटों को आकर्षित करने पर उनकी नज़र था. विश्व हिंदू परिषद् की ‘एकात्मता यात्रा’ को रवाना करने वाले समारोह में उनकी उपस्थिति इस सिलसिले का पहला कदम कहा जा सकता है. उनके निकटस्थ सीएम स्टीफ़न ने 1983 में घोषणा की कि “हिंदू संस्कृति व कांग्रेस की संस्कृति एक समान है.” अपनी हत्या से कोई छह माह पहले उन्होंने देश के बहुसंख्यक समुदाय को आश्वस्त करते हुए कहा था, “उनके साथ होने वाले किसी भी तरह के अन्याय से देश के एकता ख़तरे में पड़ जाएगी.”

 

इंदिरा गांधी उनकी बात ठीक से समझ नहीं पा रही थीं. बूटा सिंह ‘हाथ’ कह रहे थे उधर इंदिरा गांधी ‘हाथी’ समझे जा रही थीं. वे इसके लिए बार-बार मना कर रही थीं और बूटा सिंह उन्हें निरंतर समझाने की कोशिश में लगे थे कि वे हाथी की नहीं, ‘हाथ’ की बात कर रहे हैं. तंग आ कर इंदिरा ने फोन राव को थमा दिया.

आज़ादी के बाद कांग्रेस की पहली हार से पार्टी के कई नेता टूटने लगे, लेकिन इंदिरा के भीतर मौजूद योद्धा विचलित नहीं था. कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष ब्रह्मानंद रेड्डी ने सन् 1978 के पहले दिन ही इंदिरा को पार्टी से निष्कासित करने की घोषणा कर दी. तब इंदिरा ने अपने समर्थकों को लिया और नई कांग्रेस की घोषणा कर दी. इसे तब इंदिरा कांग्रेस या कांग्रेस (आई) कहा जाने लगा. रेड्डी की पार्टी कांग्रेस (आर) हो गई. लोकसभा में कांग्रेस के 153 सांसदों में से 76 इंदिरा की उस पार्टी में आ गए, जिसका अभी कोई कार्यालय तक नहीं था. यही नहीं इस आपसी विवाद में पार्टी का चिन्ह गाय-बछड़ा भी दोनों के हाथ से जाता रहा.

उन्हीं दिनों इंदिरा गांधी पी.वी. नरसिम्हा राव के साथ विजयवाड़ा के दौरे पर थीं. 24 अकबर रोड स्थित इंदिरा गांधी का निवास स्थल कांग्रेस कार्यालय के रूप में भी काम आ रहा था. कार्यालय का कामकाज देख रहे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव बूटा सिंह ने चुनाव आयोग में पार्टी चिन्ह के लिए आवेदन दिया. आयोग ने तत्काल ही उनके सामने हाथी, साइकल व पंजे के रूप में तीन विकल्प रख दिए. इस पर असमंजस में पड़े बूटा सिंह ने इंदिरा गांधी से चुनाव चिन्ह पर सहमति लेने के लिए फोन बुक किया. संभवतः टेलीफ़ोन लाइन ठीक काम नहीं कर रही थी, शायद कुछ असर बूटा सिंह के लहज़े का भी होगा कि इंदिरा गांधी उनकी बात ठीक से समझ नहीं पा रही थीं. बूटा सिंह ‘हाथ’ कह रहे थे उधर इंदिरा गांधी ‘हाथी’ समझे जा रही थीं. वे इसके लिए बार-बार मना कर रही थीं और बूटा सिंह उन्हें निरंतर समझाने की कोशिश में लगे थे कि वे हाथी की नहीं, ‘हाथ’ की बात कर रहे हैं. तंग आ कर इंदिरा ने फोन राव को थमा दिया. एक दर्जन से ज्य़ादा भाषाओं के जानकार राव तुरंत ही समझ गए कि बूटा सिंह क्या कह रहे हैं. उन्होंने इसे और स्पष्ट करने के लिए तेज़ आवाज में बूटा सिंह से कहा, यह कहो न पंजा है. इतना सुनते ही इंदिरा ने चैन की सांस ली और फोन वापस ले कर हाथ के पंजे पर तुरंत अपनी सहमति दे दी.

source- orf